Bonn Climate Change Conference takes on CO2 challenge

Curtesy by DW English

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Nearly 200 nations signed the Paris Climate Change Accord with the aim of reducing CO2 emissions, which are a major cause of climate change. But how can the Paris goals be met? Delegates from around the world will meet in Bonn to discuss just that.

जर्मनी के बॉन शहर में इन दिनों जलवायु परिवर्तन सम्मेलन चल रहा है. भारत और दूसरे विकासशील देशों का दबाव यहां काम आया और विकसित देश आख़िरकार उस ज़िम्मेदारी को मानने के लिए तैयार हुए जिससे वो लगातार बच रहे थे. बॉन में लिखी जा रही संधि में भारत ये लिखवाने में कामयाब हुआ है कि विकसित देश बताएंगे कि उन्होंने कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए अब तक क्‍या किया और आगे उनकी क्या योजना है. 

जलवायु सम्मेलन में भाग ले रहे 200 देशों के प्रतिनिधि पेरिस संधि को लागू करने के नियम तय करेंगे, जिसमें धरती के गरम होने को औद्योगिक काल के स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस पर सीमित करने का फैसला किया गया था। चांसलर मैर्केल से जर्मनी के पर्यावरण लक्ष्यों और इसमें कोयले की भूमिका पर बयान की उम्मीद की जा रही है।

जर्मनी अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण आंदोलन में अगुआ भूमिका निभाता रहा है और 23 साल पहले संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलनों की शुरुआत बॉन से ही हुई थी जब मैर्केल जर्मनी की पर्यावरण मंत्री थीं। इसलिए उनका सम्मेलन में आना अतीत की यादों से रूबरू होना भी होगा। जर्मनी में चुनावों के बाद नयी सरकार नहीं बनी है और मैर्केल इस समय उद्योग समर्थक फ्री डेमोक्रैटिक पार्टी और पर्यावरणवादी ग्रीन पार्टी के साथ गठबंधन सरकार बनाने की कोशिश कर रही है। इसलिए कोयले से चलने वाले बिजली घरों को बंद करने के बारे में कुछ भी कहना आसान नहीं होगा।

जर्मन पर्यावरण संगठन जर्मनवॉच के अनुसार पर्यावरण सुरक्षा के मामले में स्वीडन, लिथुएनिया और मोरक्को सबसे आगे हैं, लेकिन जर्मनी भारत और यूरोपीय संघ से भी पीछे 22वें स्थान पर है। सम्मेलन के दौरान जारी रिपोर्ट में जर्मनवॉच के अनुसार स्वीडन न सिर्फ औद्योगिक देशों की तुलना में कम ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन कर रहा है, बल्कि वह बड़े पैमाने पर पेड़ भी लगा रहा है जो हवा से कार्बन डायऑक्साइड सोखते हैं। 56 देशों का अध्ययन करने वाली रिपोर्ट के लेखकर यान बुर्क के अनुसार जर्मनी ब्राउन कोल यानि भूरे कोयले का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता तो है ही, प्रति व्यक्ति उत्सर्जन भी यूरोपीय संघ के औसत से ज्यादा है। बुर्क ने कहा कि आधा उत्सर्जन बिजली की वजह से होता है, इसलिए कोयले का इस्तेमाल बंद होना जरूरी है।

पर्यावरण सम्मेलन के दौरान कोयला कार्बन डायऑक्साइड के बड़े उत्सर्जक के रूप में उभरा है और बहस के केंद्र में है। अमेरिकी प्रतिनिधि कोयले से चलने वाले बिजलीघरों को कुशल बनाने की बात कह रहे हैं तो सवाल ये पूछा जा रहा है कि क्या पेरिस के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए कोयले को जलाना बंद करने की जरूरत है, और यदि हां तो कितनी जल्दी? जर्मनी में इस पर चल रहे राजनीतिक विवाद के बीच जर्मन पर्यावरण एजेंसी ने कहा है कि यदि पुराने और अकुशल 10 बिजली घरों को बंद कर दिया जाये जहां पांच गीगावाट बिजली का उत्पादन होता है तो जर्मनी 2020 तक कार्बन डायऑक्साइड का उत्सर्जन का लक्ष्य पूरा कर सकता है। अकुशल बिजली घरों में उत्पादन घटाकर और अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देकर हर साल 50 से 65 टन सीओटू कम किया जा सकता है। ग्रीन पार्टी 20 ताप बिजली घरों को बंद करने की मांग कर रही है।

जलवायु सम्मेलन में औद्योगिक देशों और विकासशील देशों के बीच एनडीसी पार्टनरशिप का विस्तार किया जा रहा है। पार्टनरशिप का मकसद वित्तीय और तकनीकी मदद देकर राष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने में विकासशील देशों को मदद देना है। जर्मनी ने इसके लिए फौरी तौर पर 3 करोड़ यूरो की राशि मुहैया करायी है। एशियाई और कैरिबियाई विकास बैंकों ने एमडीसी पार्टनरशिप में शामिल होने की घोषणा की है तो सम्मेलन के अध्यक्ष फिजी के प्रधानमंत्री फ्रांक बैनीमारामा ने प्रशांत में जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने के लिए एक क्षेत्रीय मंच बनाने की घोषणा की। जर्मनी के अलावा ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन इस योजना को शुरुआती मदद देंगे। एक साल पहले एनडीसी पार्टनरशिप के गठन के बाद से सदस्यों की संख्या 41 से बढ़कर 77 हो गयी है। इसमें 48 विकासशील देश, 16 औद्योगिक देश और 13 अंतरराष्ट्रीय संगठन शामिल हैं। भारत इनमें नहीं है।

पर्यावरण से होने वाले नुकसान से गरीब देशों की मदद के लिए भी पहल की गयी है। इंसुरेजिलिएंस नाम वाली बीमा पहल का लक्ष्य 2020 तक विकासशील देशों के 40 करोड़ लोगों का जलवायु परिवर्तन के असर से बचाने के लिए बीमा करना है। इसके लिए 55 करोड़ डॉलर का कोष बनाया गया है, जिसमें जर्मनी का हिस्सा 19 करोड़ था। अब जर्मनी ने और 12.5 करोड़ डॉलर देने का वादा किया है। इससे दो साल पहले शुरू बीमा पॉलिसी को सस्ता बनाने में मदद मिलेगी। लोगों को प्राकृतिक आपादा की स्थिति में वित्तीय मदद दी जा सकेगी। बैनीमारामा की उपस्थिति में जलवायु परिवर्तन से प्रभावित 48 देशों और वर्ल्ड बैंक के साथ बॉन में जलवायु और आपदा बीमा की वैश्विक पार्टनरशिप शुरू की गयी। इसमें पहली बार सबसे गरीब देश और आर्थिक रूप से मजबूत जी-20 के देश एक मंच पर हैं।

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