कर्जमाफ़ी क्या स्थायी समाधान है ?

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Guest : Harvir Singh , Editor, Outlook Hindi, Sompal, Former Minister for Agriculture, Govt. of India, Nitin Desai, Former Economic Chief Advisor, GOI, Ajit Singh Yadav, National Co Convenor, Jai kisan Andolan

प्रायः कहा जाता है भारत एक कृषि प्रधान देश है, लेकिन यह कड़वा सच है कि भारत की व्यवस्था कृषि केंद्रित व्यवस्था नहीं है. भारतीय सत्ता के केंद्र में न किसान हैं और न ही कृषि कार्य से जुड़े कोई भी उद्योग.

कहने को तो यह वर्ष चंपारण सत्याग्रह का शताब्दी वर्ष है. लेकिन चंपाराण आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना गांधी के समय. उस वक़्त भी किसान बेहाल और प्रताणित थे उतने आज भी हैं. यदि न होते तो नरमुंडों के साथ नग्न आंदोलन न करते. आज किसानों को गांधी जैसा व्यक्तित्व की जरुरत है जो उनको धैर्यपूर्वक सुने लेकिन आज के नेताओ में वो धैर्य कहाँ. आज के नेता झाडू भी कैमरे को सामने रख के लगाते हैं ताकि जनता को यह पता चले कि वो स्वच्छता सुनिश्चित करने के लिये काम कर रहे हैं. पर गांधी कार्य के स्थान पर प्रचार को तरजीह नहीं देने वाले व्यक्ति थे इसीलिए उनमें धैर्य भी था और जनभावना की वास्तविक पहचान.

आज किसान चौतरफा मार झेल रहे हैं. एक ओर तो किसान अब भी कृषि कार्य की बुनियादी जरूरतों सिंचाई, बीज, उर्वरक और नयी तकनीकों से वंचित हैं, वही दूसरी ओर किसानों के उत्पादन और बाजार के बीच तर्कसम्मत सामंजस्य नहीं है. यही कारण है कि किसान आर्थिक रुप से गम्भीर रूग्ण हो गए और कर्ज में जकड़ कर आत्महत्या जैसे कुकृत्य कर बैठ रहे हैं. किसानों की आत्महत्या में सरकार की कृषि नीति भी जिम्मेदार है. क्योंकि जब भी किसानों को बाजार से लाभ मिलने की परिस्थिति बनती है तब सरकार आयात प्रोत्साहित कर उनके इस मनसुबे पर पानी फ़ेर देती है.

आजकल एक चर्चा मिडिया और जनता में तैर रही है कर्ज माफ़ी की. क्या कर्ज माफी किसानों की समस्या का स्थायी समाधान है या पूंजी केंद्रित व्यवस्था के विकल्प के रूप में मजबूत कृषि केंद्रित व्यवस्था का होना? निस्संदेह कर्ज माफी किसानों को तत्काल राहत देती है, लेकिन केवल इसी के भरोसे नहीं रहा जा सकता है. क्योंकि जब तक कृषि नीति में किसानों के हित सुरक्षित नहीं होते तब तक कर्ज माफी के बाद भी किसानों की जिंदगी अंधेरे के गर्त में ही रहेगा. इसी समस्या के हल के लिए किसान चाहे तमिलनाडु के हों पिछले एक महीने से नरमुंडों के साथ देश की राजधानी में प्रदर्शन कर रहे हैं. उन किसानों ने देश के प्रधानमंत्री से मिलने की भी कोशिश की, लेकिन उन्हें मिलने नहीं दिया गया. मजबूरन उन्हें नग्न होकर प्रदर्शन करना पड़ रहा है. निश्चित रूप से देश के किसानों के लिए यह सबसे जटिल समय है. यहाँ तक कि उनके लिए कोई शोकगीत भी नहीं रचे गए हैं.

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